Posted on 4th Jan 2017 19:28:34

तनख़्वाह (पैसों) को महीने की आख़िरी तारीख़ तक बचाने का नुस्ख़ा!

ये वाक़िया एक अरबी नौजवान का है, ये अपनी ज़िंदगी से खुश नहीं था, उस की तनख़्वाह सिर्फ चार हज़ार रीयाल थी, शादीशुदा होने की वजह से उस का खर्चा उस की तनख़्वाह से कहीं ज़्यादा था, महीना ख़त्म होने से पहले ही उस की तनख़्वाह ख़त्म हो जाती और उसे क़र्ज़ लेना पड़ता, यूं वो आहिस्ता-आहिस्ता कर्ज़ों की दलदल में डूबता जा रहा था, और उस का यक़ीन बनता जा रहा था कि अब उस की ज़िंदगी इसी हाल में ही गुज़रेगी, बावजूद ये के उस की बीवी उसके माली हालत का ख़्याल करती, लेकिन कर्ज़ों के बोजे में तो सांस लेना भी दुशवार होता है.

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